Monday, June 19, 2023

Happy young boy!

Let me narrate to you a story,
About a happy young boy;
He lived with his extended family,
Wealthy and full of joy.
Grew up- studied well,
Never knowing where to go;
So always did what was expected of him,
Just kept his head low.
Soon he realised,
Life isn't just shades of grey;
As he stepped out of his bubbled life,
He thought it was better to be somewhere away.
But a leap of faith is a leap nonetheless,
Not everyone always make it through;
Decided to stay where he was,
And the feeling of not-belonging just grew.
Mediocrity gave way to disappointment,
Pent up emotions made him anxious;
When approval never came from close quarters,
The never fading want of it made him obnoxious.
He was told he wasn't good at ANYTHING,
Not even at being a son;
Maybe that is when depression beared its teeth,
Sucked up all the joy and dried up all the fun.
He decided to fight these monsters head-on,
He wasn't going to lay his arms down;
But little did he realise,
Accepting the presence of these monsters was enough for all to scorn and frown.
Alone once again -with his enemies inside him,
He chose to battle for his life;
His strength to defeat his own vices,
Became a reason for outside strife.
Every good story should end with a moral,
Well his is a little too true;
Tears, loneliness and struggle is the bleak reality,
Why else do you think the sky above is always blue!

~Saurav Goyal

Friday, June 16, 2023

Anxiety, Piety!

I do not know how to explain it,

When I'm asked about my anxiety.

It is like every other feeling you get,

Can you describe to me fear, or your piety;

You hear noises, in my head I feel them;

You see tears or sadness, I taste them;

You distract yourself with reels and texts;

My body crashes like your phone's dying battery;

My hands, they shake; my arms go completely numb;

My eyes see only darkness ahead; and my legs under me, succumb!

You ask me about my anxiety,

And I'll never know how to explain.

Have you been gripped with an unwarranted fear,

That stepping out of your room might end your life?

Have you been so physically drained in bed,

That you are not sure if it is morn or time to switch off the lights?

Do your thoughts of self-help,

Every leave you dotted on your skin?

Do you ever want to speak up- or shout -

But you can't find your tongue, your voice, or how to even begin?

I know it's all in my head;

Just like the cholesterol around your heart.

But your wishes for them to go, alone

Wouldn't take you very far!

You can either help me, or leave me be,

Where do you see the scope of a middle ground?

I would never leave you, though;

If you were to develop an ulcer in your fucking mouth!


~Saurav Goyal

Sunday, June 19, 2022

An Anxious Affair


Like the hands of a tireless clock,

This brain doesn't know when to stop.

Mornings; noons; evenings; nights;

The sun doesn't rest and neither do I.

You start at zero and get worked-up till five,

I live at seven, at nine am really alive.

It is a condition they tell me,

How my brain had been wired!

Genes; environment; suppressed memories;

Honestly, for this error alone, God should be fired.

Mediation; meditation; medication;

These just seem like the rest of my life.

In spite of everything worth living for, my brain tells me "die",

Half my days are spent fighting myself, it's a daily strife.

Don't you dare pity me, please save your sympathy,

Do not even try to be the "nice guy",

I'm neither sick, retarded, nor handicapped,

I am just an anxious bird that may never fly.

I cannot even remember the last time I was free,

Free of this grip that my mind has on me,

Not since I'm an adult, for sure;

Neither in college, nor school, nor before.

The only memory I can recall free of this spell,

Is that of a small boy, listening to stories his Dadi would tell!

~Saurav Goyal

Saturday, April 30, 2022

Paltu Khargosh

किस दिन, किस पल,
बराबर याद नही ।
पर कुछ चार साल पहले,
एक पालतू खरगोश पाला था ।
डरा सा, सहमा सा,
कपकपाता कमरे के कोने में पाया था ।

ना उसके लबों पर बोल थे,
ना उसके नन्हे पैरो में दम ।
बस उसकी आँखें  पुख्ता थी,
रात भर उसे चमची से पानी पिलाया था ।
उसी रात अनजाने में,
एक पालतू खरगोश पाला था ।

सुबह उठा देखा हर तरफ,
वह खरगोश कहीं जा चुका था ।
शायद माँ से बिछड़ा होगा,
दिन भर की थकान मिटाने मेरे घर आया था ।
लौट गया अपने परिवार को,
खुद को यही समझाया था ।

यूँ ही कई रोज़ बीत गए,
एक रात कुछ तनाव सा था ।
ज़ुबान सूख कर तालवे से चिपक रही थी,
दिल किसी अनदेखे बोझ से नीचे दबा जा रहा था ।
उस रात जब पहुँचा कमरे में,
वह खरगोश को लौटा खड़ा पाया था ।

कुछ तो राज़ था इस पल में,
जाने क्यों वह इसी रात यहाँ था ।
उसे देख बहुत खुशी सी हुई,
जैसे एक बिछड़ा दोस्त घर आया था ।
पर पिछले बार से लगभग दुगना बड़ा,
खरगोश अब मासूम नही, खूंखार नज़र आ रहा था ।

अब उसे चमची की जरूरत नही थी,
वह बोतल कुतर कुतर के पानी पिए जा रहा था ।
मेरे कमरे पर वह पूरी तरह कब्ज़ा कर,
हर कोने में अपनी गंदगी फैला रहा था ।
उस खरगोश को शायद मैंने नही,
उस खरगोश ने मुझे अनजाने में पाला था ।

मेरे कमरे के दरवाज़े पर संत्री बन कर,
मुझे बाहर निकलने से रोके जा रहा था ।
कभी धोखा देकर जो निकल जाता छुपके से,
चैन की सांस बिना किसी मुश्किल ले पाता था ।
फिर जैसे ही लग जाता अपने रोज़ के कामों में,
तब अकस्मात उस खरगोश को अपने सामने खड़ा पाता था ।

उस खरगोश के देह की सफेदी काली पड़ने लगी थी,
उसका चेहरा उसके दातों के लिए छोटा पड़ने लगा था ।
वह पूरे दिन मेरे साथ घूमता ही,
अब रातों को सपना में भी डराने लगा था ।
अब पूरा यकीन हो चुका था,
उस खरगोश ने ही मुझे पाल रखा था ।

कोई और जो देख पाता उसे,
तो मदद लेकर पिंजरे में बंद कर सकता था ।
किसी से जो बात करू तो एक टक मुझे घूरे,
अकेले रहने के खयाल से भी डर लगने लगा था ।
कैसे पीछा छुड़ाएं अपने इस मनहूस साए से,
हर वक्त सिर्फ यही सोचने लगा था ।

बाहर सूरज कितना ही तेज चमका दे,
मेरे चारों ओर मेघले बादलों का घनघोर अंधेरा था ।
वह खरगोश ने मेरी भूख मार दी, और
मुझे अंदर से खा कर खुद का पेट भर रहा था ।
अब वह मेरे कमरे में नही,
मेरे अंदर ही पल रहा; बड़ा हो रहा था ।

घुटन महसूस होती है बंद कमरे के भीतर,
मेरा तो शरीर ही एक बंद कमरा बन चुका था ।
घंटो घंटो तक रुके बिन हर रोज़ रोया,
पर एक आंसू का कतरा तक आंखों से ना निकल पाया ।
जब उम्मीद की आखरी डोर तक छूट रही थी,
तो "भोर से पहले सबसे अंधेरा होता है" याद आ रहा था ।

फिर जुटा के हिम्मत बहुत, बताया दोस्त यारों को,
मदद चाहिए मुझे, जीना यूं बहुत मुश्किल हो रहा था ।
कुछ समझ ना सके मेरी बातों को, मज़ाक में उड़ा दिया,
बस एक ने थामा हाथ, और गले से लगा लिया ।
वह खरगोश बिलकुल हैरान, मेरे अंदर गोते लगाने लगा,
छटपटा कर, दुम छुपाकर, उल्टी दिशा में भागे जा रहा था ।

शुरू हुआ फिर अपने आप को, खुद में ढूंढने का सिलसिला,
खरगोश जा चुका था, अब उसका नामोनिशान मिटाना था ।
आंखे मीचे, सांसें खींचे, खुद से बातें करने लगा,
प्यार से जब किसी ने फेरा हाथ, तो पहाड़ राई बनने लगा ।
ऊपर वाला ही देता है दिव्य - रिद्धि,
बस हाथ थामने के लिए किसी का साथ जरूरी था ।

किस दिन, किस पल,
बराबर याद नहीं ।
पर कुछ चार साल पहले,
जो पालतू खरगोश पाला था ।
हिम्मत से और अपनो के साथ से,
उसे आज हमेशा के लिए निकाल भगाया था ।।

~सौरव गोयल


Thursday, April 23, 2020

लाल छज्जा


मेरे घर के बरामदे के ऊपर
एक लाल रंगा हुआ ईटों का छज्जा है
जिसपर पिछले कुछ तीन महीनों से
दो प्यार में डूबे मैनों का कब्ज़ा है
अपनी आंखों से देखा मैंने
कैसे डालियों से, कभी रस्सी के टुकड़ों से
और कभी बिजली के पुराने कटे तारों को
जोड़ कर एक गोल और गहरा
उन्होंने बड़े एकसार सा शानदार घर बनाया है।


कई दफा सोचा इसे हटा दूं
मेरा घर है, आखिर क्यों इन्हे पनाह दूं?
बदबू आती है, फर्श भी गंदा रहता है
सुबह सूरज की किरणों के साथ
इन दोनों का बेसुरा शोर भी घर में घुसता है
कभी कहीं हड्डियों के टुकड़े पड़े होते है, और कभी
बिल्लियों का झुंड बरामदे के नीचे खड़ा दिखता है।


पर फिर कभी जब
इनके घोसले को खाली देखता हूं
दिल मानो थोड़ा बैठ सा जाता है
अनजाने में ही इनकी राह तख्ता हूं
दो बेजुबान पंछी कैसे इतने करीबी हो गए
अपनी थाली में भी इनकी आधी रोटी अब अलग रखता हूं।


जब कभी दोस्त आते है घर, तो मुझसे कहने लगते है
"उत्तर दिशा में इनका बड़ा शोर रहता है
वास्तु के लिए यह बिल्कुल ठीक नहीं है।"
अगर किराया देती यह दो मैना, तो मैं पाठ करा लेता
दिशाओं के बुरे प्रकोप को ठिकाने लगा देता
प्रकृति ने जो खुद दिया है, उसे भला क्यों हटा दूं
वास्तु ठीक हो भी जाए, इंसानियत की क्या दवा पिलाऊं?


मेरे घर के बरामदे के ऊपर
जो लाल रंगा हुआ इटों का छज्जा है
वह अब हमेशा के लिए
मेरे प्यारे पंछियों का बगीचा है।।


~सौरव गोयल